Poetry

सजदा-ऐ-मुहोब्बत.


वो जो कहते है, तुम वर्गला गए हो मुहोब्बत के नाम पे,
मेरी जॉ उन्होंने इक क़तरा भी न पिया कभी इश्क़ के जाम से!

होने लगी है रंगत उनकी शफ़क़ पूनम के चाँद सी ,
उल्फत-ऐ-यार में अब हम भी रहे न किसी काम के !

इक दिल होता है और इक सनम का हुस्न-ऐ-दीदार होता है,
हाल-ऐ-दिल गज़ब हो गया है अपना हर सुबह-ओ-शाम पे !

तमाम उम्र किया ना जिस काफिर ने सजदा-ऐ-ख़ुदा,
ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़ हुए मुल्ला वो इमाम के !

है ये जादू उनकी “तब्बसुम’ का या जलवा उनकी निगाहो का है,
कई दफा आती है मुझको सदा मदनु की सर-ऐ-आम से !

आरती (तब्बसुम)

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